Thursday, September 26, 2024

लद्दाख में 14 दिन, दूसरे दिन की कहानी

लद्दाख में 14 दिन 

दूसरा दिन 

सुबह तीन बजे अपने नियमानुसार उठा। बन्द कमरे मे सन्नाटा पसरा पड़ा था। बाहर गैलरी में जलती ट्यूब लाईट की झीनी रोशनी मेरे कमरे के घुप्प अंधेरे और सन्नाटे में उजाला कर रही थी।

हम दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों में रहने वालो के लिए बड़ी अजीब बात थी कहीं कोई आवाज़ ही नही थी। कुछ नही तो ध्यान में पंखे या एसी की आवाज़ न आए उसके लिए मैं ईयर बड्स लगाता हूं । 

लेकिन लेह के उस बड़े से कमरे में इतनी शान्ति थी जहां मैं अपनी आती जाती सांसों की आवाज़ साफ़ सुन सकता था ।

ध्यान में तो अपनी सांसों को देखता सुनता महसूस करता रह हूं। अपनी सांसों से बात भी की है कई बार। लद्दाख में बात करना और आसान हो गया है। कमरे की शान्ति ने मेरा दिल जीत लिया।

ध्यान, ॐ और अनलोम विलोम में तीन घण्टे कब पास हो गए पता ही नही चला। 6.30 बजे तैयार हुआ ही था तभी दरवाजे पर थाप हुई नीनू की आवाज़ के साथ मैंने दरवाजा खोला हम walk के लिए तैयार थे । 

केंटीन के बाहर अलग अलग तरह के बेहद खुबसूरत फूल थे । हम walk करते हुए थोड़ा आगे ही बड़े थे कि हमें स्कूल ड्रेस में कुछ नन्ही परियां मिली। सब सड़क सफाई अभियान में लगी थी। उनमें से कुछ बच्चियों से बात की, सब डॉक्टर ही बनना चाहती थी । अच्छी बात यह थी कि डॉक्टर बनकर वो वापस लद्दाख में ही सेवा करना चाहती है। ऐसा होगा इसका जवाब गर्भ में छुपा है ।

वृद्धा आश्रम से थोड़ा आगे जाकर हमने देखा थोड़ी दूरी पर बुद्ध की एक बहुत ऊंची सुनहरी मूर्ति स्थापित की गई है जो पिछली डॉक्युमेंट्री के दौरान नही बनी थी। इस खुबसूरत स्थान को नाम दिया गया है बुद्धा गार्डन बुद्धा पार्क । एक बहुत बड़ी बैठे बुद्ध की मूर्ति स्थापित कर दी गई है । नीचे उस मूर्ति के चार तरफ करीब 60 बुद्ध मूर्तियों का निर्माण हो रहा है । पूर्ण निर्माण होने के बाद ये क्षेत्र महाबोधि का सबसे आकर्षक स्थान होगा।  

इसी के पास सफेद रंग के बुद्ध मूर्ति का निर्माण किया गया है सफेद यानि शान्ति, कुछ खोने का एहसास, बुद्ध ने तो सब कुछ खोकर ही पाया था निर्वाण। 

इस सफेद मूर्ति के पीछे एक तिकोने ध्यान केंद्र का निर्माण किया गया है कहते है तिकोना ध्यान केन्द्र ध्यान को सबसे अधिक केन्द्रित करता है । मुझे पता नही ऐसा होता है क्योंकी मैं तो कहीं भी आंखें बंद करता हूं तो मेरा ध्यान कहीं भी लग जाता हैं। कहीं भी ध्यान लगना ही सर्वश्रेष्ठ ध्यान है। ध्यान लगना क्या है मतलब कुछ भी न लगना ही ध्यान है निराकार कुछ भी न दिखना।

महाबोधि में बहुत से ऐसे ध्यान केन्द्र उपलब्ध है जिन्हे पहाड़ी चट्टानों के बीच बनाया गया है जिसमे आप अकेले बैठ कर कितनी ही देर ध्यान कर सकते है लेकिन मुझे बताया गया करोना में उन्हे बन्द कर दिया गया था। तब से उन्हे शुरू नही किया गया है उम्मीद है उन स्थानो को जल्द पुनः शुरु किया जायेगा।

दोपहर बाद हमें गुरुजी का बुलावा आया हम स्कूल में मिलेंगे। हम स्कूल पहुंचे हमने वहां काफ़ी शूटिंग की। गुरुजी ने हम लोगो को सफेद अंग वस्त्र देकर सम्मानित किया यह एक विशेष परम्परा है जिसमे एक सफेद मफलर नुमा वस्त्र को गले में पहनाया जाता है। गुरु जी ने सब बच्चों को बताया कि मैंने 12 साल पहले भी एक documentary बनाई थी और इस बार फिर से उससे बेहतर व्रतचित्र का निर्माण होगा।

गुरु जी ने छोटे बच्चों के स्कूल में जाकर उनसे बात की छोटे बच्चों में जाकर वो बच्चे ही हो जाते है । उसके बाद हम पास में ही वृद्धा आश्रम गए।

वृद्धा आश्रम में अभी करीब 40 बुजुर्ग रह रहे है यह संख्या कम बढ़ होती रहती है सभी को देखकर दया नही ऊर्जा मिलती है । कोई चलने से लाचार है कोई देखने से किसी को कम किसी को अधिक पक्षाघात है । कोई अपने हाथ को मुंह तक भी नही ले जा पाता। यानि कमियां हज़ार है लेकिन जीवन के प्रति नज़रिया प्रतिकूल है। सुबह शाम walk करने की जिद है बुद्ध के प्रति पूजा पाठ के प्रति समर्पण है, गुरु जी के आते ही मिलते ही सबके चेहरे की मुस्कान सब तकलीफे भुला देती है ।

गुरुजी गले लगाते है सबसे बात करते है तो उन सब बुजुर्ग बच्चों की आंखे नम हो जाती है । कुछ खुशी में रोते है कि यह बुद्ध सेनानायक नही होता तो उनका रक्षक कौन होता। कुछ उन्हे छूकर महसूस करते है अब सब ठीक है कोई चिन्ता नही। 

सब साथ खाते है पूजा करते है खेलते है एक दूसरे का सहारा बनते है । उनकी देखरेख के लिए 6 करीब महिलाएं और दो तीन व्यक्ति दिन रात मेहनत करते है। लगता तो नही कि इनमें से कोई अपना धैर्य खोता हो। 

महाबोधि के स्कूल के बच्चे अक्सर इन बुजुर्गो के पास आते रहते है उनसे बातें करते है खेलते है उन सब बुजुर्गो को लगता है हमारे पोते नाती बच्चे हमसे मिलने आए है। बच्चे उनका जन्मदिन मनाते है । सबसे अच्छी बात है करीब करीब सभी बुजुर्गो की memory अभी भी ठीक है।

दिसम्बर जनवरी में जब तापमान 20 डिग्री से नीचे चला जाता है तब महाबोधि की अन्य गतिविधियां स्कूल आदि सब बंद हो जाते है सिर्फ यह बुजुर्ग उस भयानक सर्दी में आश्रम में रह जाते है क्योंकि यहीं उनका घर है लेकिन गुरु जी ने हीटर और गीजर की ऐसी व्यवस्था की हुई है कि सभी बुजुर्ग उस सर्दी में भी सुरक्षित रहते है। 

एक बुजुर्ग को देखकर मैंने जॉय और पदमा से प्रश्न किया इनको तो कोई दिक्कत नही है बुजुर्ग भी नही अधिक ये यहां क्यों है उत्तर पाकर एक बैचेनी सी हुई। यह अभी कुछ माह पहले ही सरकारी सेवा से निर्वत हुए है घर परिवार है नही दूर पास का रिश्तेदार भी नही है । उन्हें इस वृद्धाश्रम में आकर लगता है यहां मैं सुरक्षित और जीवन के प्रति नियमों से बंधा हूं। यहां बुद्ध और गुरुजी के सानिध्य में निश्चिन्त हूं बाकी साथियों के काम आ सकूं वो सुकून देता है। 

एक नेपाली व्यक्ति मिला जो छोटी उम्र में ही नेपाल से भाग आया था तमाम जगहों पर रोजी रोटी के संघर्ष के बाद वो लेह पहुंच गया शायद उसकी किस्मत में यही लिखा था। मजदूरी का काम करता था एक दिन बेहोश हुआ तो कितने ही महीने कोमा में रहा। उसकी उम्र अधिक नही है पचास से कम ही होगी।

एक डॉक्टर की कृपा से दिमाग का ऑपरेशन हुआ। होश में आया सोचने समझने की स्थिति में था नही शरीर का निचला हिस्सा दोनों पैर पैरालाइसिस हो गए थे। डॉक्टर गुरु जी को जानता था उन्होने गुरुजी से सम्पर्क कर बुजुर्ग आश्रम में जगह दिलाई। गुरुजी तो हमेशा ऐसे लोगो की भलाई करने के लिय तत्पर रहते है।

अच्छी देखरेख से दवा दुआ से सोचने समझने की स्थिति में वापस आ गया संघर्ष कर चलने लगा सुबह शाम एक दो किलोमीटर walk करता है मैंने उसे बोला अगली बार मिलेंगे तो तुम दौड़ते हुए मिलोगे यह वायदा करो वो मुस्करा कर बोला इतना हो गया है तो वो भी होगा ।सिर्फ वो ही है सभी बुजुर्गों में जो हिन्दी समझ बोल लेता है। 

गुरुजी ने बुजुर्गों के आश्रम में ही एक स्थान पर हॉस्पिक का निर्माण किया है। हॉस्पिक क्या होता है मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं थी। हॉस्पिटल तो सुना है । उस हॉस्पिक में चार bed है डॉक्टर का केबिन है नर्स है । वहां ऐसे मरीजों को रखा जाता है जिसे दवा से अधिक दुआओं की जरूरत पड़ती है। 

इन स्थानों को cover करने के बाद हमने अपने विश्राम ग्रह में आराम किया। रात को भोजन कर रहे थे तब एक ऐसा व्यक्ति अचानक मेरे सामने खड़ा हो गया जो जापान में रहता है अब, जो अभी भी मेरे सम्पर्क में है लद्दाख आने से पहले मैंने msg में उन्हे कहा था मैं तुम्हे miss करूंगा ग्यूरमैट। उसने मुझे कहा वो भी मुझे miss करेगा। वो शादी कर पिछले कई वर्षो से जापान में ही रह रहे है।

उनका नाम बुलाना मुझे हमेशा आसान नही लगा। पिछली documentary movie shooting के समय तेनजिन ग्यूरमैट ने बहुत मदद की थी वो महाबोधि में ही पला बढ़ा हुआ है। गुरुजी ने ही मॉस कॉम की पढ़ाई नोएडा के एक अभिनय स्कूल में करने में मदद की थी । और अचानक वो मेरे सामने था मुझे surprise देने के लिए। मैं वास्तव में आश्चर्य में था क्योंकि उसने मुझे जरा सी भी भनक नही लगने दी कि वो लद्दाख आ रहा है। 

उन्होने बताया वो कुछ विदेशी मित्रों के साथ लद्दाख आये है। आपको surprise देना था इसलिए मिलने आया। मैं फिर मिलने आऊंगा। हम बहुत गर्मजोशी से मिले। जैसे बिछड़े मित्र मिलते है। हमने थोड़ी देर बात की,  रात काफी हो चली थी करीब 9 बज रहे थे। लेह में 7 बजे ही समय काफ़ी हो जाता है।

कमरे में आया तो शान्ति अद्भुत थी मैं ध्यान में बैठा तो पता ही नही चला कितनी देर ध्यान में बैठा रहा। 2 बजे नियमित समय के अलार्म ने तंद्रा भंग की । तीन बजे स्वयं से शुभरात्रि बोला, ईश्वर को धन्यवाद कहा कि ऐसे शान्त स्थान पर 13 दिन रहने का अवसर दिया।

 फिर मिलते है तीसरे दिन की कहानी के साथ।

हरीश शर्मा 





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